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Thursday, April 23, 2015

तिरे जमाल-ए-हक़ीक़त की ताब ही न हुई (जिगर मुरादाबादी)

तिरे जमाल-ए-हक़ीक़त की ताब ही न हुई
हज़ार बार निगह की मगर कभी न हुई

तिरी ख़ुशी से अगर ग़म में भी ख़ुशी न हुई
वो ज़िंदगी तो मोहब्बत की ज़िंदगी न हुई

कहाँ वो शोख़ मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई
बस एक बार हुई और फिर कभी न हुई

वो हम है अहल-ए-मोहब्बत की जान से दिल से
बहुत बुखार उठे आँख शबनमी न हुई

ठहर ठहर दिल-ए-बेताब प्यार तो कर लूँ
अब उस के बाद मुलाक़ात फिर हुई न हुई

मिरे ख़याल से भी आह मुझ को बोद रहा
हज़ार तरहा से चाहा बराबरी न हुई

हम अपनी रिदी-ओ-ताअत पे ख़ाक नाज़ करें
क़ुबूल-ए-हज़रत-ए-सुल्ताँ हुई हुई न हुई

कोई बढ़े न बढ़े हम तो जान देते हैं
फ़िर ऎसी चश्म-ए-तवज्जोह हुई हुई न हुई

तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिल
इस एहतिमाम पे भी शरह-ए-आशिक़ी न हुई

फ़र्सुदा-ख़ातिरी-ए-इश्क़ ए मआज़-अल्लाह
ख़याल-ए-यार से भी कुछ शगुफ़्तगी न हुई

तिरी निगाह-ए-करम को भी आज़मा देखा
अज़ीयतो में न होनी थी कुछ कमी न हुई

किसी की मस्त-निगाही ने हाथ थाम लिया
शरीक-ए-हाल जहाँ मीरी बे-ख़ुदी न हुई

सबा ये उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से सुब्ह ओ शाम ही न हुई

वो कुछ सही न सही फिर भी ज़ाहिद-ए-नादाँ
बड़े बड़ों से मोहब्बत में काफ़िरी न हुई

इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी
कि हम ने आह तो की अन से आह भी न हुई

ख़याल-ए-यार सलामत तुझे ख़ुदा रक्खे
तिरे बग़ैर कभी घर में रौशनी न हुई

गए थे हम भी 'जिगर' जल्वा-गाह-ए-जानाँ में
वो पूछते ही रहे हम से बात भी न हुई

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