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Wednesday, October 14, 2015

ये नाज़ुक दिल पत्थर भी हो सकता है (साजिद सफ़दर)

ये नाज़ुक दिल पत्थर भी हो सकता है
शीशा टूट के खंजर भी हो सकता है
یہ نازک دل پتھر بھی ہو سکتا ہے 
شیشہ ٹوٹ کے خنجر بھی ہو سکتا ہے


जिन आँखों को सहरा समझा है तुमने
उन आँखों में सागर भी हो सकता है
جن آنکھوں کو سہرا سمجھا ہے تم نے 
ان آنکھوں میں ساگر بھی ہو سکتا ہے

वक़्त कहाँ लगता है वक़्त बदलने में
जो पत्थर है गौहर भी हो सकता है
وقت کہاں لگتا ہے وقت بدلنے میں 
جو پتھر ہے گوہر بھی ہو سکتا ہے

बदतर जिसको जान रहे हो वो रिश्ता
कोशिश हो तो बेहतर भी हो सकता है
بدتر جسکو جان رہے ہو وہ رشتہ 
کوشش ہو تو بہتر بھی ہو سکتا ہے

चुभ जाये तो देखो शिक़वा मत करना
शेर हमारा नश्तर भी हो सकता है
چبھ جائے تو دیکھو شکوہ مت کرنہ 
شعر ہمارا نشتر بھی ہو سکتا ہے

जंग अगर हो हक़ की तो फिर मैदां में
एक अकेला लश्कर भी हो सकता है 
جنگ اگر ہو حق کی تو پھر میداں میں 
ایک اکیلا لشکر بھی ہو سکتا ہے

साजिद सफ़दर
ساجد صفدر

1 comment:

  1. "जिन आँखों को सहरा समझा है तुमने
    उन आँखों में सागर भी हो सकता है

    बदतर जिसको जान रहे हो वो रिश्ता
    कोशिश हो तो बेहतर भी हो सकता है"

    क्या खूब कही.....

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