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Wednesday, March 18, 2015

अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर के हम हैं (निदा फ़ाज़ली)

अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं;

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता हैं,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं;

वक्त के साथ है मिटटी का सफर सदियों से,
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं;

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब,
सोचते रहते हैं किस राह गुज़र के हम हैं;

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम,
हर कलमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं; 

                                                                      --- निदा फ़ाज़ली

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