Pages

Tuesday, November 10, 2015

इतनी शर्तों पर कोई कैसे संभाले ज़िन्दगी (साजिद सफ़दर)

इतनी शर्तों पर कोई कैसे संभाले ज़िन्दगी
सोचता हूँ कर ही दूँ उसके हवाले ज़िन्दगी
اتنی شرتوں پر کوئی کیسے سنبھالے زندگی 
سوچتا ہوں کر ہی دوں اس کے حوالے زندگی

वक़्त ए आखिर तुझको मोहलत ही कहाँ मिल पायेगी 
वक़्त रहते नेकियां भी कुछ कमा ले ज़िन्दगी 
وقت آخر تجھکو موہلت ہی کہاں مل پایگی 
وقت رہتے نیکیاں بھی کچھ کما لے زندگی 

इम्तेहाँ कोई भी हो निकलेंगे हम साबित क़दम 
जैसे चाहे हमको वैसे आज़मा ले ज़िन्दगी 
امتحاں کوئی بھی ہو نکلیںگے ہم صابط قدم 
جیسے چاہے ہمکو ویسے آزمالے زندگی 


मेरे हिस्से का तो सूरज हो गया कब का गुरूब 
लाऊँ अब जाकर कहाँ से मैं उजाले ज़िन्दगी
میرے حصّے کا تو سورج ہو گیا کب کا گروب 
لاؤں اب جاکر کہاں سے میں اجالے زندگی 

बेखुदी में जीने वालों ने सिखाये वो हुनर
जिनके ज़रिये जी रहे हैं होश वाले ज़िन्दगी
بیخودی میں جینے والوں نے سکھاے وہ ہنر 
جنکے ذریع جی رہے ہیں ہوش والے زندگی 

मैं तुझे यूँ ढूंढता हूँ ऐ मिरी जाने ग़ज़ल 
ढूंढ़ती फिरती है जैसे दो निवाले ज़िन्दगी 
مینے تجھے یوں ڈھونڈتا ہوں اے مری جانے غزل 
ڈھونڈتی پھرتی ہے جیسے دو نوالے زندگی 

दिल को बहलाने के "साजिद" खूब हैं नुस्खे मगर 
ग़म हो सीने में तो कैसे मुस्कुरा ले ज़िन्दगी
دل کو بہلانے کے "ساجد " خوب ہیں نسخے مگر 
غم ہو سینے میں تو کیسے مسکرا لے زندگی 

                                                        ساجد صفدر साजिद सफ़दर

No comments:

Post a Comment